अमेरिका और इजरायल द्वारा 28 फरवरी को ईरान पर किए गए हमले और उसके जवाब में ईरान की कड़ी कार्रवाई ने वैश्विक स्तर पर गंभीर चिंता पैदा कर दी थी। हालात तब और बिगड़े जब ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया, जिससे कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उछाल आ गया। करीब 40 दिन तक चले इस संघर्ष के बाद दोनों पक्ष 15 दिनों के सीजफायर पर सहमत हुए और अब शांति वार्ता की दिशा में कदम बढ़ाया गया है। शनिवार, 11 अप्रैल 2026 को इस्लामाबाद में होने वाली इस अहम बैठक पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।
पाकिस्तान की पहल पर बातचीत की मेज पर आए दोनों देश
पाकिस्तान ने इस संवेदनशील स्थिति में मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए अमेरिका और ईरान को बातचीत के लिए राजी किया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दो सप्ताह के युद्धविराम की घोषणा के साथ इस्लामाबाद में वार्ता की पुष्टि की थी। ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बगेर ग़ालिबफ़ के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल, विदेश मंत्री अब्बास अरघची के साथ शामिल हो रहा है। वहीं, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जे डी वैंस कर रहे हैं, जिनके इस्लामाबाद पहुंचने के बाद वार्ता शुरू होने की योजना है।
इस्लामाबाद पहुंचा ईरानी प्रतिनिधिमंडल, हुआ उच्चस्तरीय स्वागत
ईरानी प्रतिनिधिमंडल के इस्लामाबाद पहुंचने पर पाकिस्तान सरकार और सेना के शीर्ष नेतृत्व ने उनका स्वागत किया। उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार, नेशनल असेंबली के अध्यक्ष अयाज़ सादिक, सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सैयद आसिम मुनीर और गृह मंत्री सैयद मोहसिन रज़ा नक़वी इस मौके पर मौजूद रहे। पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के अनुसार, यह उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल सीधे वार्ता में भाग लेने के लिए पहुंचा है।
बातचीत से पहले ईरान की कड़ी शर्तें, बिना पालन के वार्ता पर रोक
शांति वार्ता से पहले ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि कुछ पूर्व शर्तों के बिना बातचीत शुरू नहीं होगी। ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दो प्रमुख मुद्दों पर सहमति लागू होना जरूरी है—पहला, लेबनान में पूर्ण युद्धविराम और दूसरा, ईरान की जब्त संपत्तियों की रिहाई। इन शर्तों को पूरा किए बिना बातचीत आगे नहीं बढ़ेगी, जिससे वार्ता की शुरुआत पर अनिश्चितता बनी हुई है।
अमेरिका की दो टूक चेतावनी, ‘सद्भावना हो तो स्वागत, धोखे पर सख्ती’
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे डी वैंस ने वार्ता से पहले स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि ईरान ईमानदारी से बातचीत करता है तो अमेरिका तैयार है, लेकिन किसी भी तरह की चालबाजी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। बताया जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वार्ता को लेकर अपनी टीम को स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं, जिससे संकेत मिलता है कि अमेरिका इस बार सख्त रुख अपनाने के मूड में है।
लेबनान मुद्दा भी बना बड़ा विवाद, वार्ता पर पड़ सकता है असर
ईरान ने लेबनान में इजरायली हमलों को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया है। ईरानी विदेश मंत्री ने साफ कहा है कि अमेरिका को युद्धविराम की अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करना होगा, जिसमें लेबनान को भी शामिल किया जाना चाहिए। ईरानी राष्ट्रपति ने इसे पहले हुए युद्धविराम का उल्लंघन बताते हुए चेतावनी दी है कि अगर ये हमले जारी रहे तो बातचीत का कोई मतलब नहीं रहेगा।
क्या पाकिस्तान करा पाएगा सुलह, दुनिया की नजरें इस्लामाबाद पर टिकीं
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है। शहबाज शरीफ की पहल और कूटनीतिक प्रयासों के बाद ही दोनों देश बातचीत के लिए तैयार हुए हैं। पाकिस्तान ने उम्मीद जताई है कि दोनों पक्ष रचनात्मक तरीके से आगे बढ़ेंगे और पश्चिम एशिया में स्थायी शांति का रास्ता निकलेगा। हालांकि, सख्त शर्तों और आपसी अविश्वास के चलते यह राह आसान नहीं दिख रही।
कड़ी सुरक्षा के बीच ‘रेड अलर्ट’ पर इस्लामाबाद, 10 हजार से ज्यादा जवान तैनात
शांति वार्ता को देखते हुए इस्लामाबाद में सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए गए हैं। पूरे शहर को रेड अलर्ट पर रखा गया है और 10,000 से अधिक पुलिस और सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की गई है। रेड ज़ोन में सेना और रेंजर्स को जिम्मेदारी सौंपी गई है, जहां केवल अधिकृत लोगों को ही प्रवेश की अनुमति है। इस उच्चस्तरीय बैठक के नतीजे न केवल पश्चिम एशिया की स्थिरता बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी गहरा असर डाल सकते हैं।
